गुरु महिमा अपार, वेद गाते गए हार, हम मति मूढ़ निज कदम बढ़ाते हैं।
ज्ञान राशि सागर हो, सब गुन आगर हो, आप ही विद्यालयों में जाकर पढ़ाते हैं।
वीणापाणि के हो दास उन्हीं से लगाते आस, आप कच्ची मिट्टी से भी कुंभ को गढ़ाते हैं।
प्रभु से प्रथम आप जग में न तौल नाप, तव चरणों में शब्द सुमन चढ़ाते हैं।
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