गरमी नरमी नहिं लाय रही सुखवाय करी यह नागफनी।
मनई बिललाय रहा अतना बिललाय रही धरती जतनी।
फसलै सबकी सब सूखि रही सब बोलि रहे गरमी कतनी।
कुछु धानन वार निगाह करौ बरसाय दियौ भगवान तनी।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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