तुम्हारी याद आती है, मुझे कितना सताती है,
कि वो इतना सताती है, रुलाती है, रुलाती है।
भुलाना चाहता हूँ मैं, मगर मुमकिन नहीं होता,
तेरी आवाज़ अब भी मेरे कानों में गुनगुनाती है।
तेरे जाने से वीराँ हो गया है घर मेरे दिल का,
हर इक कोना तेरी ख़ुशबू की बातें ही सुनाती है।
न जाने किस दुआ का सिलसिला अब तक चला होगा,
तेरी तस्वीर आँखों में अभी तक मुस्कुराती है।
न कोई ख़त, न कोई फ़ोन, न कोई हाल ही तेरा,
मगर उम्मीद हर दस्तक पे मुझको आज़माती है।
लगा कर दिल जिसे हमने ख़ुदा से भी बढ़ाकर था,
वही अब बेवफ़ाई की कहानी ही सुनाती है।
'रज़ा अब भी मोहब्बत पर यक़ीं रखता है दुनिया में,
भले ही ज़िंदगी हर मोड़ पर धोखा दिखाती है।
-इम्तियाज़ रज़ा
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