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ग़लत फहमी

                
                                                         
                            गफलत में जमाना,
                                                                 
                            
इल्जाम ढूंढ लेता है,
कैफ़ियेत ज़माने की,
कोई “हाल-ए-बिसात” पे,
गुमराह की एक अजीब बस्ती है,
जो हराम में भी,
“सुकून-ए-तौफ़ीक़” इजाद कर लेता है.
कोई ताबुत सर हिला,
कोई खौफ रंजिश दिखा
ए सैलाब इस बार तू,
कयामत बर्षा.
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2 महीने पहले

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