इश्क कब हुआ तुमसे हमको हमें नहीं मालूम
शखसियत ही तुम्हारी है ऐसी शायद तुम्हें नहीं मालूम
राते कई गुजार दी तुम्हारी बारात के इंतजार में
दफन एक रात कर दिया चुपचाप इश्क को जुमेरात में
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X