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लुटाये प्रेम जो, पोवारी भाषा पर

                
                                                         
                            लुटाये प्रेम जो,
                                                                 
                            
मातृभाषा पोवारी पर।
असो साहित्यिक भाषा को,
सौंदर्य ना वैभव बढाय पाये।।

न्यौछावर करे निष्ठा जो,
मातृभाषा पोवारी पर।
असो साहित्यिक भाषा को,
सौंदर्य ना वैभव बढाय पाये।।

विकसित करें आसक्ति जो,
मातृभाषा पोवारी पर।
असो साहित्यिक भाषा को,
सौंदर्य ना वैभव बढाय पाये।।

विकसित करें भक्ति जो,
मातृभाषा पोवारी पर।
असो साहित्यिक भाषा को,
सौंदर्य ना वैभव बढाय पाये।।

बिछाए शास्त्रीय दृष्टि जो,
मातृभाषा पोवारी पर।
असो साहित्यिक भाषा को,
सौंदर्य ना वैभव बढाय पाये।।

सोचे गहणता लक जो,
मातृभाषा पोवारी पर।
असो साहित्यिक भाषा को,
सौंदर्य ना वैभव बढाय पाये।।

करें प्रेम की वृष्टि जो,
मातृभाषा पोवारी पर।
असो साहित्यिक भाषा को,
सौंदर्य ना वैभव बढाय पाये।।

-ओ सी पटले
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3 घंटे पहले

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