आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं पराया ही था

                
                                                         
                            मैं पराया ही था जहान में क्या?
                                                                 
                            
ग़म ही उतरेगा इस मकान में क्या?

मोल मेरा लगा न पाया कोई
दीमकें लग गईं सामान में क्या?

जिस पे भी मैंने एतबार किया
ख़ंजर ही था उसकी ज़बान में क्या?

मुझ को अपनाया ही नहीं तुमने
कुछ कमी थी मेरी पहचान में क्या?

थक गया हूँ मैं इस ज़माने से
और कुछ बाक़ी है इम्तिहान में क्या?

सब ने बे-क़द्र ही किया मुझको
दाग़ ही था मेरे ईमान में क्या?

लोग धोखे ही दे गए 'लाला'
झूठ ही बिकता है दुकान में क्या?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर