तुम्हारे जाने के बाद
मैंने अपने घर की हर खिड़की खुली रखी,
शायद लौटती हुई हवा
तुम्हारे कदमों की कोई ख़बर ले आए।
मगर लौटकर आईं तो केवल ऋतुएँ—
बसंत आया, फूल खिले,
बरसात आई, मिट्टी महकी,
सर्दियाँ आईं, धूप भी उतरी आँगन में...
पर मेरे भीतर का मौसम
उसी दिन से पतझड़ बना हुआ है।
तुम्हारी याद
किसी तस्वीर की तरह नहीं,
एक धीमे ज़हर की तरह है—
जो हर दिन थोड़ा-थोड़ा
मेरी ख़ामोशी में घुलती रहती है।
मैंने तुम्हें भुलाने के लिए
वक़्त की नदी में
हज़ारों दिन बहा दिए,
पर अजीब बात है...
किनारे बदलते रहे,
लहरें बदलती रहीं,
सिर्फ़ तुम्हारा नाम
मेरे भीतर की चट्टान पर
वैसा ही लिखा रहा।
अब मैं हँसता हूँ,
लोग कहते हैं—
"देखो, यह तो संभल गया।"
उन्हें कौन बताए
कुछ लोग रोना छोड़ देते हैं,
क्योंकि आँसू भी
एक दिन थक जाते हैं।
कभी-कभी लगता है,
मोहब्बत एक दीपक थी,
जिसे हमने दोनों ने मिलकर जलाया था।
तुम अपने हिस्से की रोशनी लेकर चल दिए,
और मेरे हिस्से में
सिर्फ़ धुएँ की गंध रह गई।
अगर कभी
किसी ख़ामोश शाम
तुम्हें बिना वजह बेचैनी घेर ले,
तो समझ लेना—
कहीं कोई दिल
अब भी तुम्हारे नाम का
एक अधूरा गीत गुनगुना रहा है।
प्रेम का सबसे बड़ा दुख
बिछड़ना नहीं होता...
सबसे बड़ा दुख यह होता है कि
जिसे हमने अपनी दुआओँ का आख़िरी शब्द बनाया,
वही एक दिन
हमारी ख़ामोशियों का
सबसे लंबा अर्थ बन जाता है।
और तब इंसान मरता नहीं...
वह बस जीता है—
राख में दबी हुई धूप की तरह,
जो बाहर से ठंडी दिखती है,
पर भीतर अब भी
धीरे-धीरे जल रही होती है।
— हेम
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