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मैं मौन रहकर पूछता, क्या तुझमें भी तन्हाई है?

                
                                                         
                            तू नूर है, मैं शाम हूँ, जो रोशनी को तकता हूँ,
                                                                 
                            
तू चाँदनी, मैं साया हूँ, जो चाँद पर ही रुकता हूँ।

तेरी नज़र, इक जाम सी, मैं रोज़ इसे पीता हूँ,
तेरी हँसी, इक नशा है, मैं इसमें खोकर जीता हूँ।

तू फूल है, जो खिल गया, मैं शाख़ सूखी, बंजर हूँ,
तू रंग है, जो छा गया, मैं फिर भी कोरा काग़ज़ हूँ।

तू धूप बनके आई है, मैं छाँव में सिमटा हूँ,
तू बह चली, इक धारा है, मैं तट पे बस ठहरा हूँ।

तेरी हँसी, वो साज़ है, जो दिल में राग भरता है,
तेरा करम, इक दवा है, जो दर्द को संवारता है।

तेरा असर, इक आग है, मैं राख बनने वाला हूँ,
तू दर्द है, एहसास है, मैं सहने को भी तैयार हूँ।

तू पास है या दूर, हर साँस में समाई है।
मैं मौन रहकर पूछता, क्या तुझमें भी तन्हाई है?

 
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2 दिन पहले

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