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पत्थर-ए-कदम

                
                                                         
                            अल्फाज़ो के काफ़िले रफ़्ता-रफ़्ता कम हो गए
                                                                 
                            
      आपके याद में हमारे चश्म-ए-नम हो गए
    
   गुज़िश्ता बाते मिटने नही देती यादों का काँरवा
    आपके निध्यान से नमक के भी मरहम हो गए
    
    लाख दुआए कर के भी अपने हासिल नही होते
आप जो मिले परवरदिगार के बेहीसाब करम हो गए

    ख़्वाबो में अक्सर आपका जिक्र करते है हम
      आँखे खुली तो सारे ख़याल बहम हो गए

   ठहर जाते है अक्सर सुनकर आपकी ये हसीन बाते
       अल्विदा कहते कहते पत्थर-ए-कदम हो गए

          सब़ा भी चली आती है आपके आने से
    दीदार से आपके बारा माह बसंत-ए-मौसम हो गए

         अनजाने इस सफ़र में दोस्त मिलते गए कई
     आपके इल्तिफ़ात से हम ख़ुश-ओ-ख़ुर्रम  हो गए

- हर्षदा डोंगरे
     
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2 महीने पहले

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