सुबह होती है।
कोई अलार्म नहीं बजता,
पक्षी उड़ जाता है नीड़ से।
वह शहर की आंधी-दौड़ में नहीं शामिल,
वह तो बस...चुग रहा है अपना वर्तमान।
शाम को,
जब आसमान का रंग मटमैला होता है,
वह लौटता है।
चोंच में दबाए एक उम्मीद का दाना,
बिना किसी भव्य वादे के
सौंप देता है उसे अपनी अगली पीढ़ी को।
वह रोज सिखाता है उन्हें उड़ना,
यह कोई परंपरा नहीं, जरूरत है।
और एक दिन जब वे उड़ जाते हैं अनंत में,
वह अकेला खड़ा रहकर अवसाद से नहीं घिरता,
उसे पता है - मुक्त होना ही जीवन है।
उसने कभी नहीं बनाए बैंक अकाउंट,
न ही अनाज के गोदामों पर ताले लटकाए।
वह कल की चिंताओं के 'स्ट्रेस' से मुक्त,
पंख फैलाता है और कट जाता है समय के कैनवास पर।
"मेरा क्या होगा?"
"कौन सहेगा मेरा बुढ़ापा?"
इन मध्यवर्गीय असुरक्षाओं के चक्रव्यूह से
वह बहुत दूर है।
उसे वंश-विस्तार का कोई अहंकार नहीं।
अपेक्षाओं के इस बाज़ार में,
जहां हर रिश्ता एक सौदा है,
वह बिना किसी 'टर्म्स एण्ड कंडीशन्स' के जीता है।
हे आधुनिक मानव!
तेरी डिग्रियों और दर्शनशास्त्र से बड़ा है
उसका यह सहज, अनलंकृत संतोष।
-हरि मोहन जांगिड़
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