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पथ में काटे नहीं बिछेंगे

                
                                                         
                            उबड, खाबड
                                                                 
                            
कंकड़ ,पत्थर
सब सह लेंगे
पथ में कांटे
नहीं बिछेंगे ।
कर्म वीर है
हम धरती के
इस उपवन के
इसी गगन के
उल्का पिंड
गिरे ना ऊपर
फिर चमके गे
सूरज बन के।
हट जाएंगे
राह के पत्थर
लम्बी यात्रा
चले निरंतर
फिर दमकें गे
फिर महके गे
एक नई खुशबू
को लेकर ।
आवर्तो के
विषम जाल को
चूहों सा
हम खा सकते
हैं
है भागीरथ के
हम बेटे
गंगा नई बहा
सकते हैं
उगती नहीं
जहां भी घासें
उपवन वहा
उगा सकते हैं।
फेक फाक
आलस्य की चादर
श्रम की बूंद
बहा सकते हैं ।
फिर कल्ले
फूटेगे
निकले गी कलियां
हाथ मिलाएं गी
बल्लीरियाँ
मरी सीपियों से
संतुष्ट नहीं
घर मोती से
भर लेंगे
पथ में काँटे
नहीं बिछेंगे।।

-हंस नाथ यादव
 
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3 दिन पहले

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