काश ये जिंदगी मेरे पापा के जैसे होती, फिर जिन्दगी में खुशियों ही खुशियां होती।
हर सुबह मेरी हर एक खुशी को वो पूछती और शाम ढलते ख्वाहिशें मुकम्मल हो जाती।
पता नहीं उनके जेब में कितने पैसे थे, पर मेरी खुशियों की हर कीमत उनके पास होती।
ऐ जिंदगी हो सके तो एक दिन के लिए मेरे पापा का सलीक़ा रखना।
फिर अँधेरे में जलाकर ख़ुद को, मेरे लिए सरे-राह उजाला रखना।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X