पावन यह कोजागिरी, शरद पूर्णिमा रात।
दूध-खीर छत पै धरें, मेटे सब उत्पात॥
मेटे सब उत्पात, चंद्रमा रूप अनूपा।
पावन रजनी आज, करे आरोग्य सुरूपा॥
कह 'गोकुल' कविराय, पर्व है यह मनभावन।
चंद्र किरण से आज, अमृत बरसे अति पावन॥१॥
जागत कोई रात में, पावे लक्ष्मी-दान।
'को-जागर्ति' कहे भली, मति-वैभव-सन्मान॥
मति-वैभव-सन्मान, ध्यान जो निश-दिन लावै।
अलस-प्रमाद विहाय, परम सुख-संपति पावै॥
कह 'गोकुल' कविराय, मिटे अंतर-दुख रोई।
मिले मात-आशीष, सदा सुख जागत कोई॥२॥
शरद उजाली यामिनी, शीतलता बरसाय।
काम-क्रोध मद त्यागिए, पावन मन हुलसाय॥
पावन मन हुलसाय, ध्यान ईश लगा दीजै।
सकल भेद बिसराय, प्रेम-रस अमृत पीजै॥
कह 'गोकुल' कविराय, पियो रस-अमृत-प्याली।
निर्मल करहु विचार, लखो यह शरद उजाली॥३॥
-गोवर्धन बिसेन 'गोकुल'
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