आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुझको गुजरे हुए तो जमाने हुए

                
                                                         
                            मुझको गुजरे हुए तो जमाने हुए ।
                                                                 
                            
' मैं जिंदा था ' किस्सा पुराने हुए ।।

मुझको जिंदा समझना भूल थी तेरी ,
छोड़कर पिंजड़ा परिंदा बेगाने हुए ।

अरे, मौत से कम नहीं तन्हा रहना,
जीने की ख्वाहिश तेरी याराने हुए ।

सोचा न था , कभी तन्हा रहना होगा ,
मेरी तन्हाई अब इश्क़ के तराने हुए ।

जीना हराम किया था जिसने जिंदगी मेरी ,
वही जनाजे में आने को दीवाने हुए ।

थक गया हूँ जिंदा लाश को ढोते - ढोते ,
सुपूर्द - ए - खाक में मिलकर कृष्ण ' अफ़साने हुए ।
- गोपी नाथ कृष्ण
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर