न जाने क्यों अब ,
पंक्तियों में शब्दों का ,
सुहस्तक्षेप न रहा,
कविता बन ही जाती थी,
सुयोग अब ऐसा न रहा..
न जाने क्यों अब,
सारे सच अब भी अधीर हैं,
उठ रहे मनोभाव वैसे ही,
नहीं ठहर रहा बहाव भाव,
फिर न जाने क्यों अब,
सज नहीं रही पहले सी,
अलंकार भी हैं, रस भी हैं,
फिर न जाने क्यों अब ,
श्रृंगार कर नहीं रही,
कविता अब बन नहीं रही...
विषमता में डूबी कलम थी,
तब भी सोम ही छलकता था,
सुधा पान अब कराता हूं,
फिर क्यों तुम लेखनी ,
अब वैसी चल नहीं रही,
डर है कि कहीं वो,
कविता ही तो रूठ नहीं गई ...
-गिरीश इंदौरकर ' हमराही '
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