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रहना यहीं पे

                
                                                         
                            जाते नहीं हैं कोई दुनिया को छोड़ के...
                                                                 
                            
आते हैं सब यहीं पे चोले बदल बदल के...
श्रीराम भी आये द्वापर में कृष्ण बनकर...
दशानन भी आये तब शिशुपाल बनकर...
जड़ भरत भी आये थे वन में मृग बन के।
आते हैं सब यहीं पे चोले बदल बदल के...।।
जाते नहीं हैं कोई दुनिया को छोड़ के...
आते हैं सब यहीं पे चोले बदल बदल के...।।
हर जीव को है लगता लख-चौरासी का फेरा...
अल्पजीवी हो या दीर्घजीवी, जमाता है यहीं डेरा...
हम थे कल भी और होके रहेंगे फिर कल के।
आते हैं सब यहीं पे चोले बदल बदल के...।।
जाते नहीं हैं कोई दुनिया को छोड़ के...
आते हैं सब यहीं पे चोले बदल बदल के...।।
जन्मते मनाते खुशियाँ मरने पर रोना-धोना...
कहते हैं 'गिरिजा' यह है सिर्फ जज्बाती टोना...
आत्मा अमर है यह जाती नहीं कहीं टल के।
आते हैं सब यहीं पे चोले बदल बदल के...।।
जाते नहीं हैं कोई दुनिया को छोड़ के...
आते हैं सब यहीं पे चोले बदल बदल के...।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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