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अलबेला मैं

                
                                                         
                            मैं एहसास करता हूं, निगाहें भी साथ करता हूं।
                                                                 
                            
कभी हवाओं पे गरजता हूं तो, कभी धूप में छांव की तलाश करता हूं।
कभी खिलखिलाके हंस लेता हूं, कभी खनकता भी नहीं गिरने पर,
मैं कभी साथ चलते-चलते अपने रास्ते अलग कर लेता हूं।
मैं हर रोज़ सवेरा करता हूं, हर शाम कहीं छिप जाता हूं,
कोई पूछे मेरा नाम पता मैं आसमान को घर बताता हूं।
नहीं मैं चमकता नहीं हर सपने जैसे,
पर मुस्कान जैसे उभर जाता हूं।
मैं एहसास करता हूं, निगाहें भी साथ करता हूं।
आँखों में नमी नहीं आए, मैं हर बात तो टाल जाता हूं,
मैं कमज़ोर हूं कितना, कभी नहीं जताता हूं।
है लाख कमी मुझमें मगर, मैं खुद से जीत जाता हूं।
कहूँ मैं कितनी अपनी बातें, मैं पहेली सा उभर आता हूं,
हर कोई गलत समझ बैठे मैं ऐसा बैर लगाता हूं।
मैं एहसास करता हूं, निगाहें भी साथ करता हूं।
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4 घंटे पहले

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