चोट जलाती है,गिरते हैं, उड़ते हैं, फिर खड़े हो जाते हैं।
हम खिलौने नहीं, इंसान हैं साहब,इसी साहस से बड़े हो जाते हैं।
तेज़ धूप हो या बरसात,बचते-बचाते आगे बढ़ते जाते हैं।
हम इंसान हैं,सब कुछ सहकर अपनी राह बनाते हैं।
रास्ता उल्टा हो या सीधा,या सामने समंदर ही क्यों न हो, साहब,अपने साहस से उसे भी जीत जाते हैं।
गिरते-पड़ते चलते हैं, फिर खड़े हो जाते हैं, साहब।हम इंसान हैं,आत्मविश्वास और साहस के बल पर समंदर को भी पार कर जाते
-गिरजा शंकर पचौरी "शिवाय "
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