आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

होठों पे उल्फत के फ़साने नही आते,

                
                                                         
                            नफरत को मोहब्बत की आँखों में देखा,
                                                                 
                            
बेरुखी को उनकी अदाओं में देखा,
आँखें नम हुई और मैं रो पड़ा,
जब अपने को गैरों की बाहो में देखा।

होठों पे उल्फत के फ़साने नही आते,
जो बीत गए फिर वो जमाने नही आते,
दोस्त ही होते हैं, दोस्तों के हमदर्द
कोई फ़रिश्ते यहां साथ निभाने नही आते।

ज़िन्दगी एक कबिता हैं,
गुनगुनाते रहिये।
मुश्किले हैं लाख फिर भी,
मुस्कराते रहिये।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर