नफरत को मोहब्बत की आँखों में देखा,
बेरुखी को उनकी अदाओं में देखा,
आँखें नम हुई और मैं रो पड़ा,
जब अपने को गैरों की बाहो में देखा।
होठों पे उल्फत के फ़साने नही आते,
जो बीत गए फिर वो जमाने नही आते,
दोस्त ही होते हैं, दोस्तों के हमदर्द
कोई फ़रिश्ते यहां साथ निभाने नही आते।
ज़िन्दगी एक कबिता हैं,
गुनगुनाते रहिये।
मुश्किले हैं लाख फिर भी,
मुस्कराते रहिये।
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