बिन बुलाए बुआ कहे, सुनकर रोए प्राण
जिस आँगन में जन्म ली, वहाँ नहीं सम्मान।
मायका था जो कभी, सपनों का संसार
आज वहीं मेहमान हूँ, कैसा यह व्यवहार।
माँ की आँखों में नहीं, पहले जैसा प्यार
सूखे पत्ते सा हुआ, बेटी का अनुराग।
राखी लेकर आ गई, मन में लिए उमंग
लेकिन अपने ही हुए, अनजाने जैसे संग।
चौखट बोली आ गई बचपन वाली छाँव
लेकिन रिश्तों ने कहा, अब न रहा वो गाँव।
माँ को सबकी फ़िक्र थी, सबके सुख की बात
बेटी के मन का मगर, न समझी जज़्बात।
नाना-नानी के यहाँ, ढूँढे बचपन धाम
स्मृतियाँ तो मिल गई, खो गया सम्मान।
धन-दौलत की चाह ना, ना हिस्सों की आस
बस अपनापन की बनी रही, जीवन भर प्यास।
राखी का धागा कहे, मत तोड़ो विश्वास
रिश्तों की इस राख में, बची प्रेम की आस।
माँ, मैं तेरी कोख की भूली-बिसरी याद
मुझको भी दे दीजिए, थोड़ा सा संवाद।
राखी अब भी बाँधती, मन से मन के तार
पर मायके की वेदना, करती है लाचार।
रिश्तों की राख तले, दबी हुई है पीर
जीते जी मर रही, बेटी की तक़दीर।
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