बारिश तुम बरसना
बारिश तुम बरसना, तरसती हैं जड़ें, तरसती है धरती
तुम सड़कों की चिंता मत करना
वे तो भरेंगी घुटने तक, किसानों की नहीं है गलती
तुम बरसना कि कुछ बचे हुए कुएं भर जायें
नदियाँ तो रह नहीं गईं, तालाब पर इमारतें बन गईं।
तुम बरसना कि कुछ पेड़ों को जल मिले
जंगल तो रहे नहीं, और खेत भी हाईवे बन गए।
तुम बरसना कि कुछ नदिया बहने लगे
नलों में जल तो बह नहीं रहे, बोतलों में भर लिए जाएं।
तुम बरसना कि पत्ते झूम उठे भींग कर
पंछियाँ भीगे हुए पंख फड़फड़ाए
जैसे कोई, अल्हड़ युवती, भीगे हुए बालों को झाड़े
उन सड़कों को राहत हो
जो पहियों और पैरों की गर्मी से सूख गई हों।
तुम बरसना कि बरसात होने की याद रहे
अचानक से भींगने की याद रहे
आँखों में बूंदों की परत छा जाने की याद रहे
भीगे हाथों से चेहरा पोछने की आभास रहे।
तुम बरसना कि पानी की सौगात रहे।
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