“मिटती इंसानियत”
स्वार्थ की इस आँधी में,
डगमगाए पाँव हैं।
बुझ रही है धीरे-धीरे,
मानवता की छाँव है।
ईश्वर ने बनाया जिसके लिए,
वो इंसान भूल गया।
रिश्तों का एक एक धागा,
नादान इंसान भूल गया।
मुस्कान बाँटना,
गिरते को थामना,
कहाँ खो गया है,
मानवता का रूप?
जमीं पर उतर आई है,
स्वार्थ की धूप!
मशीनों के संग रहकर,
खुद मशीन बन गए।
दर्द से बेगाने होकर,
खुद में ही लीन बन गए।
हमदर्दी गुम हुई,
बाजार सज गए,
जेबें भरने की दौड़ में,
इंसान थक गए।
अनुभव का सागर जो,
बुज़ुर्ग हमारे हैं,
जिन्होंने उँगली पकड़कर,
चलना सिखाया था,
आज भीड़ में अकेले,
वही बेसहारा हैं।
गली-कूचों से गूँजती,
मदद की पुकार है,
पर स्वार्थ की दीवारों के,
कान बंद मिले हर बार हैं।
क्या सीने के भीतर,
पत्थर रख लिया है?
अब तो बाज़ारों में भी,
मुस्कान बिकने लगी है!
ओ मुसाफिर-ए-राह,
अभी भी वक्त बाकी है।
तेरी पहचान सिर्फ,
क्या दौलत की झाँकी है?
किसी के आँसू पोंछना,
ही तेरा धर्म है।
मीठा बोलना, प्यार देना,
बड़ों का सम्मान ही,
तेरी सच्चा कर्म है।
-.शिव राय पुरी
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