स्वार्थ की दीवारें तोड़ो, रणभूमि में हुंकार भरो।
गिरते को थामो वीर बनो, मानवता का श्रृंगार करो॥
जज्बातों का अब मोल नहीं, लोभ में सब बिक जाते।
वीर वही जो दुख पर, तलवार नहीं—सहारा देते॥
धरती रोके श्वास कहे, क्या यही है परिणाम!
सत्य का दीप बुझा नहीं, वीर रखे उसको धाम॥
जो पर पीड़ा को अपना समझे, वही सच्चा रणधीर।
उनसे ही जीवन जगमगाए, न हो जग शव अधीर॥
चलो दीवानगी जगाएँ, मानवता का ध्वज उठाएँ।
उदास मुख पर हँसी सजाएँ, यही पुकार वीरता गाएँ॥
- शिव राय पुरी
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