मेरा नुक़सान न करो, मैं हूँ पूरी नहीं,
फिर भी सच्ची हूँ, इतनी बुरी नहीं।
मेरी बात तारीफ़ है, अगर डर लगता हूँ तो बोलो —
क्या है तुम्हारी ईमानदारी?
…फिर तू बोला: तुम्हारी ईमानदारी से डर लगता है मुझे।
हो… तुम हो, तुम हो…
बोले, “बड़ी ख़र्चोर है, पैसे की आफ़त है,”
हर बात पर रोक-टोक, हर बात एक सख़्त सी नसीहत है।
ज़रा-सी ग़लती पर मुझसे बड़ा मत करो,
बस इतना बोलो — तुम्हारा वह कठोर अंदाज़,
मुझे उठाकर दूसरे पन्ने पर खड़ा कर देता है।
जहाँ मैं “इधर क्यों नहीं, उधर क्यों नहीं” की सज़ा काटती हूँ,
इसी बात पर तुम मुझसे नफ़रत करते हो, मैं जानती हूँ।
मगर… तुम हो, तुम हो…
जो तुम्हारी आँखों में किरकिरी हूँ मैं,
वही तुम्हारे घर की बुनियाद भी हूँ मैं।
मुझे पूरा न समझो, तो क्या हुआ,
तेरे हर सवाल का जवाब भी हूँ मैं।
दूसरे पन्ने की स्याही ने पूछा एक दिन,
“क्यों खड़ी हो यहाँ? पहला पन्ना किसका हुआ?”
मैंने कहा, “जिसने मुझे नफ़रत दी, वही मेरा लिखने वाला हुआ,
और वही मेरा क़िस्सा हुआ… वही तुम हो, तुम हो।”
अब नुक़सान न कर, न होगी मुझमें कमी,
मैं अच्छी हूँ — यह बात तूने कभी मानी नहीं।
तेरी ईमानदारी का दर्द, तेरे कठोर अल्फ़ाज़,
यह सब तुझ तक जाने का ज़रिया हैं आज।
मुझे इधर-उधर न कर, बस इतना कह —
“मैं तुमसे नफ़रत करता हूँ” — इसमें भी छुपा है “प्यार” का रस्ता।
क्योंकि आख़िर में बचता क्या है?
बस तुम… तुम हो… तुम हो… (मौला, तुम हो)
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X