अंधेरों की बिसात पर,
दीया जला के देख ले।
तुझे गिराए जो समय,
तू मुस्कुरा के देखले!
डर की यह दीवारें,
तुझको रोक ना पाएँगी,
सत्य की ये मशालें,
राह नई दिखाएँगी
तू चालाकी से दूर रह,
समझदारी को ढाल बना,
कम शब्दों के तीरों से ही,
अधर्म का तू काल बन!
तकनीकी इस दौर में,
मानवता का धर्म संभाल,
मशीन जब हावी होने लगे,
तू संस्कारों का रूप ढाल
किसी के बेतुके आदेश की,
गुलामी तू अब छोड़ दे,
जो रोकती है तुझे आज,
उन ज़ंजीरों को तोड़ दे!
उठ खड़ा हो ऐ मुसाफ़िर,
अब कोई ना मलाल हो,
तेरे हर एक कदम पर,
जीत का गुलाल हो!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X