भीड़ में खाली जगह भले ही कम पड़ जाए,
हक़ जहाँ माँगे, वहाँ बस कुर्सियाँ कम पड़ जाएँ।
माइक वाले ख़ामोश हों या ना हटने को राज़ी हों,
हम ख़ुद ही पीछे हटेंगे, जब नीयतें कम पड़ जाएँ।
यह पीछे हटना साबित न करे कि हम नादान हैं,
या ज़माने की नज़र में बस कोई उफ़नता तूफ़ान हैं।
हम सब अपनी ही जगह पर अडिग रहकर दिखाएँगे,
इतिहास के हर पन्ने पर जो दर्ज है, बदलेंगे वो पहचान!
मानस-पटल पर नाम अपना हम उकेरेंगे ज़रूर,
इस कठिन यात्रा में अपना पथ उकेरेंगे ज़रूर।
कलम भले हर हाथ में मौजूद हो इस जग के,
हम साझी सच्चाई का नया इतिहास लिखेंगे ज़रूर।
था धनुष अर्जुन के पास और व्यथा कुंती के पास,
कथा सबकी अपनी थी, अपना-अपना अहसास।
पर ग्रंथ जो रचा गया, वो सिर्फ़ एक ही बना,
अब हम सब मिलकर लिखेंगे हर एक का इतिहास!
इस अनोखे युद्ध के वक्ता भी हम, पात्र भी हम,
मंच के दर्शक भी हम, और श्रोता भी हम।
जब उठेगा पर्दा और खाली बचेगा यह समाँ,
सर झुकाकर मंच पर, जब अलविदा कहेंगे हम...
तो 'मैं-मैं' का राग अपने मुख से न गाएँगे कभी,
शेर की खाल ओढ़कर छलावा न दिखाएँगे कभी।
जब भी दहाड़ेंगे, हम झुंड में ही दहाड़ेंगे,
अकेले 'मैं' का परचम अब न फहराएँगे कभी!
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