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जिसमें मैं, मेरी ही नहीं रही हूँ

                
                                                         
                             ये सुकून के चंद पल,
                                                                 
                            
ये आराम के कुछ लम्हे,
बिन तेरे जाने क्यों
मन भर सुकून नहीं दे पाते।

कुछ तो खाली रह जाता है,
उस खाली वक़्त में भी
तेरी यादों को ये मुझसे
जुदा नहीं कर पाते।

जानती हूँ मैं, तेरे लिए शायद
उतनी ख़ास नहीं,
शायद तेरे पास मुझसे बढ़कर
और भी शख़्स होंगे कई।

पर मेरे लिए तू वो एक लम्हा है
जिसे मैं दिन-रात जी रही हूँ।
मेरे लिए तू मेरा वो आईना है,
जिसमें मैं, मेरी ही नहीं रही हूँ।

 
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3 महीने पहले

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