जीवन भर एक गीत लिखूंगी
अक्षर अक्षर प्रीति लिखूंगी।
शब्द कोई चाहे अर्थ कोई हो
भावों में मनमीत लिखूंगी।
सांसों की अविरल माला में
गूंथ लिए तेरे नाम के मोती।
मुक्ता मुक्ता उंगली पर थिरके
मौन जपूंगी ना मोती गिनूंगी।
घन अंधकार में रुके तूलिका
यह मुझको स्वीकार नहीं।
हृदय की उजली चौखट पर
स्मृतियों का दीप धरूंगी।
दैहिक सामाजिक बंधन नहीं
प्रेम शाश्वत निष्पाप अमर है।
मिलना और बिछड़ना साथी,
यह तो जग की रीति लिखूंगी।
प्रीत नहीं पीपल पात सी
प्रीत अविनाशी पीपल बीज है,
समय की निष्ठुर प्राचीरों पर
प्रेम की ही जीत लिखूंगी।
कीचड़ में क्या कांटों में,
फूल सदा ही खिलते हैं।
अश्रुसिंचित उर्वर भूमि में,
अमित प्रेम की नीति लिखूंगी।
- महिमा शुक्ला ‘उत्तरायणी’
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