दिमाग़ी नक्सल या भविष्य देश का ?
हक़ माँगने वालों को क्या,दिमागी नक्सल कहोगे तुम ?
हमारे देश के यह बच्चे हैं,क्या इन पर ज़ुल्म करोगे तुम?
सवाल जो पूछ लें तुमसे, क्या उनको ग़द्दार बताओगे?
अधिकार माँगने वालों को,कब तक यूँ ही सताओगे?
शिक्षा का व्यापार बना है,बिकती हर एक डिग्री हैं
मेहनती की झोली खाली, लाचारी बस सिमटी हैं
डिग्री थमा के हाथों में, बना दिया लाचार यहाँ
शिक्षा बेची,सपने बेचे,बेची तुमने हर आस यहाँ
रोजी-रोटी माँगने पर,क्यों लाठी बरसाते हो?
खुद तो महलों में सोते हो,हमको सड़कों पर जगाते हो?
ग़रीबी की मार सही हैं,हम सहते आए हर एक दमन
अपने अधिकारों का लेकिन,न होने देंगे अब हनन
कल के भारत की किस्मत हैं,राहों पर खड़े हैं जो युवा
इनकी आवाज़ दबाने को, क्यों फैलाते ज़हरीला धुआँ
हक़ माँगना गुस्ताख़ी हैं तो,यह गुस्ताख़ी बार-बार होगी
न्याय की बेदी पर अब तो, सच की तल्ख़ पुकार होगी
नाम बदलकर नक्सल का, तुम आवाज़ न दबा पाओगे
दमन का चक्र चलाकर तुम, आंदोलन न रोक पाओगे
जो दीप जला है न्याय का,वो आंधी में भी जलेगा
हर बच्चा इस देश का अब,अपना हक लेकर ही रहेगा
युवा शक्ति तूफ़ान बनेगी, देश के गली-चौराहे पर
कहर बनकर टूट पड़ेगी, ज़ुल्म और तानाशाही पर
दिमाग़ी नक्सल कह कर तुम,क्या बच्चों पर प्रहार करोगे?
अधिकारों पर अड़े रहे तो,क्या उनका तुम संहार करोगे?
यह ख़ामोशी तूफ़ान बनेगी,गली-चौराहा बोल उठेगा
तख़्त तुम्हारा डोलेगा तब,हर युवा जब जाग उठेगा
सुन लो ओ हुक्मरानों, तुम अपनी ही नींव हिलाओगे,
हक़ की आंधी जब उठेगी, तुम तख़्त समेत बह जाओगे
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