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बदल गई मैं

                
                                                         
                            कितनी बदल गयी मैं
                                                                 
                            
हर बार गिर-गिर कर
संभल गई मैं।
जिंदगी कि हर धूप को
हॅसते हॅसते सह गयी मैं।
कितनी बदल गयी में ,
शायद हर नफ़रत को
मुहब्बत में बदल कर
थक गयी मैं।
कितनी बदल गयी मैं
आईने को देखकर पूछा
करती हूँ मैं ,
अभी सफर कितना बाकी है ?
शायद चलते-चलते थक गई मैं
कितनी बदल गयी मैं
कितना कुछ छुपाये रखा
हैं वक्त ने अपने सीने में,
जब आँखों में समय
की धुंध छाने लगी
और दिल की ख़ामोशी
कुछ भुलाने लगी ,
जाते जाते हर कोई
दर्द देता गया ,
तूने भी तो औरो जैसा दर्द दिया ,
शायद ज़ख्मो को कुछ ज़्यादा
ही मरहम दे गई मैं,
कितनी बदल गयी मैं
-अनिता गोस्वामी
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2 महीने पहले

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