एक सदी चार
दशक चार साला।।
में आवे महाकुंभ
की शुभ बेला।।
प्रयागराज को जानो
त्रिवेणी संगम
का पवित्र मेला।।
ऐसी मान्यता है
जो स्नान करें
श्रद्धा के भागीदारी।।
बने आत्म माला।।
साधु-संत, ऋषि - मुनि।।
अघोर और महाकुंभ में
साधक बन लगावे ध्याला।।
पाप धुलावे आवे
करोड़ों मानव जना।।
यहाँ आध्यात्मिक
ज्ञान का खजाना।।
सांस्कृतिक आदान
प्रदान का ठेला।।
सामाजिक समरसता
का है थैला।।
अर्धकुंभ,पूर्णकुंभ।।
की त्रिवेणी महाकुंभ।।
ऐसा मेल प्रयाग
हरि, उज्जै और नासि
में करें पुकार।।
हर द्वादश साल
में लागे चार बार।।
यह मेला है
अनूठी और विशाला।।
क्षीर सागर,मथानी
से मत्थे देव - दानव।।
निकले जो अमृत कलश
झगड़े देव - दानव।।
छलक के बूँदे गिरी।।
अमृत जगह चार।।
जहाँ तहाँ लगी।।
घड़ा रूपी मोक्ष
दायिनी संगम।।।
एक सदी चार
दशक चार साला।।
में आवे महाकुंभ
की शुभ बेला।।
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