आज कल खंजर पर।।
दांव लगने लगे है।।
बिना आवाज के
विस्फोट पर।।
जो हथियार
भगदड़ मचा दे
वह शांतिमय
चाल अब
गीदड़ भी
चलने लगे है।।
डॉल्फिन अब
मगरमच्छ की
शिकार करने
में तत्परता
दिखा रहे है।।
आज पहली बार
सिंह को दबोचे
मगरमच्छ खड़ा है ।।
कौन किस पे भारी है।।
यह निर्णय करना
अत्यंत कठिन है।।
यह पोखर में सीपों
का जमावड़ा है।।
इन्हीं को सींचने
पर मिलती है।।
बेशकीमती मोतियों
की माला है।।
पास में वो देखो
श्मशान के
भीतर कितनी
चिताओं का रेला है।।
शायद उसी में।।
से एक शख़्स
चलते हुए निकल
के जा रहे हैं।।
एक मटके में।।
चंद दैहिक राख लिए
वो भी कुछ गले।।
में पट्टा डाले।।
ऐसा लगा कि
उनका कोई अपना
बिछुड़ गया हो
आज कल खंजर पर।।
दांव लगने लगे है।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X