हमें खूब पूछती है ।।
प्रत्येक तिमाही में।।
पर चैत्र के चढ़ते ही
पीछे छोड़ देती आह में।।
कड़क मिजाज के
कारण हमें अनुभवहीन
बना देती है ।।
उसी चाह में।।
पर सावन भादो
आते ही हमारी
सगाई आरंभ
हो जाती है।।
जितना चाहो उतना
ही मौका मिल
ही जाता है ।।
इस पल हर ओर।।
वातावरण आनंदित
हो जाता है।।
जीवन कल्पनाओं में।।
गोता लगाते रहती है।।
फिर लौट आती है।।
माघ पूस की।।
कट कटाती।।
बर्फीली आघात
तब प्रकृति और ।।
आह्लादित हो उठता।।
ऐसे ही खूब हमारा।।
ध्यान रखता।।
हमें खूब पूछती है ।।
प्रत्येक तिमाही में।।
पर चैत्र के चढ़ते ही
पीछे छोड़ देती आह में।।
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