दीप जले, करें अचंभित ।।
घुल रहा कैसे चंचलित।।
ब्रह्मपुत्र सा श्वासोच्छवास सघन है ।।
विद्युती तमस का विकराल
स्वरूप मानस है।।
भीति ही आत्म मन है।।
अश्रु से तर घनेरे काले मेघ है।।
पयोद चिंघाड़ से स्वकंपित
दसों दिशाएं है ।।
सब भू की कोण थर्राये ।।
राग ऐसे गा रहे तुफां
प्रलंकाएं।।
सब हिल - मिल आरती
उगाह रहे आज मंगल।।
माया क्यों सांझ सी वधू
का के संगल।।
बिन पाख पतंग के
उड़ते परों का ।।
अक्षत रहे उस ज्वल का।।
अब तू दिखा ।।
मोती के मोल का।।
पंथ गया पग लड़खड़ाया।।
समुदाय न विलिन हो लघु
सी इस पटकथा से ।।
स्नेह स्नेह जल रहे
तीली बीच लौ से।।
आँक न सको जब
इसकी छाँह से।।
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