जितनी हसरतों से मैं तुम्हें देखता हूं,
उतनी हसरतों से तो तुम भी मुझे नहीं देखती हो,
बादलों का कसूर नहीं है कि वो बरस गए,
दिल हलका करने का शौक तो सबका होता है,
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X