इंसान हूँ मैं, इंसान हूँ मैं
धरती में श्रेष्ठ हूँ मैं।
एक बात खास है मुझमें,
थोड़ा बहुत विचार कर लेता हूँ मैं।
इंसान हूँ मैं, इंसान हूँ मैं।
परमात्मा ने जो सृष्टि
बनाई है, उनमें से हूँ मैं।
इंसान हूँ मैं, इंसान हूँ मैं।
उनकी सारी सृष्टि में
मिलता-जुलता बहुत से
स्वभाव हैं, मुझमे
थोड़ा बहुत
विचार कर लेता हूँ मैं।
इंसान हूँ मैं, इंसान हूँ मैं।
जैसे चलती हवा की लहर
सबको छू जाती है,
इसी तरह जो भी उनकी
सृष्टि बोलता है, सबको
छू जाता है।
इंसान हूँ मैं, इंसान हूँ मैं।
थोड़ा बहुत विचार
कर लेता हूँ मैं।
ईश्वर की बाकी सृष्टि जो मिले,
उसी को दिखाती है,
वही फैलता है,
पर इंसान उसे
बदलकर फैला सकता है।
हवा में सुगंध-दुर्गंध,
कौन-सा फैलाना है,
इंसान उसे बदल सकता है।
इंसान हूँ मैं, इंसान हूँ मैं।
सुगंध मन को शांति देता है,
दुर्गंध मन को अशांति देता है,
हम इंसान पता लगा लेते हैं।
दुर्गंध को जमीन के
नीचे दबा देता हूँ
और सुगंध को हवा में
छोड़ देता हूँ।
सबके मन को खुश
करता हूँ मैं।
इंसान हूँ मैं, इंसान हूँ मैं।
थोड़ा बहुत
विचार कर लेता हूँ मैं।
— दीपाली दास
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