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अपनों की ज़ुबाँ से...

                
                                                         
                            अपनों की ज़ुबाँ से...
                                                                 
                            

मैंने सुनी है अपनी ही बुराई अपनों की ज़ुबाँ से,
दिल रो पड़ा है अपनी ही रुसवाई अपनों की ज़ुबाँ से।

जिनके लिए मैं उम्रभर दुनिया से लड़ता रहा,
मुझको मिली है मेरी ही तन्हाई अपनों की ज़ुबाँ से।

जिन हाथों को थामकर मैंने सफ़र काटा था,
छूटे हैं वही हाथ, बड़ी बेवफ़ाई अपनों की ज़ुबाँ से।

मैंने तो उनके ज़ख़्म भी सीने से लगाए थे,
मिलती रही मगर मुझे गहराई अपनों की ज़ुबाँ से।

गैरों से क्या शिकायत, वो तो गैर ही ठहरे,
जो चोट लगी, वो लगी परछाई अपनों की ज़ुबाँ से।

जिनको बताया था हर एक राज़ दिल का मैंने,
निकली वही मेरी हर सच्चाई अपनों की ज़ुबाँ से।

मैं मुस्कुराता रहा, ताकि रिश्ते न टूट जाएँ,
रोता रहा मगर अपनी ही खामोशी में छुपकर।

कितना अजीब दर्द है रिश्तों की दुनिया में—
अपना ही दे गया हमें सफ़ाई अपनों की ज़ुबाँ से।

अब किससे पूछूँ कि मेरी ख़ता आखिर थी क्या,
जब फैसला हो गया बिना सुनवाई अपनों की ज़ुबाँ से।

कुछ लोग पास रहकर भी अपना नहीं होते,
मिलती है उम्रभर बस जुदाई अपनों की ज़ुबाँ से।

जिसे समझा था मैंने अपना आख़िरी सहारा,
उसी ने छीन ली मेरी परछाई अपनों की ज़ुबाँ से।

अब दिल किसी से अपना हाल कहता नहीं है,
डरता है फिर न निकले सच्चाई अपनों की ज़ुबाँ से।

“अनाहत” अब रिश्तों से कोई शिकवा नहीं है,
बस एक सबक मिला है—तन्हाई अपनों की ज़ुबाँ से।

 
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2 सप्ताह पहले

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