अफ़वाहों के उड़ने से...
अफ़वाहों के उड़ने से, रिश्ते ख़ाक होते जा रहे हैं,
जो अपने थे कभी, वो आज बेबाक होते जा रहे हैं।
किसी ने बात आधी की, किसी ने रंग भर डाला,
हमारे नाम के किस्से अब पाक होते जा रहे हैं।
न हमने कुछ कहा उनसे, न कोई राज़ खोला था,
मगर ख़ामोश होंठों के भी इम्तिहान होते जा रहे हैं।
जिसे दिल में बिठाया था, वही पत्थर लिए बैठा,
हमारे ख़्वाब आँखों में हलाक होते जा रहे हैं।
कभी जो दर्द पढ़ लेते थे आँखों की ज़ुबाँ से भी,
वही अब आँसुओं को भी मज़ाक कहते जा रहे हैं।
किसी की एक अफ़वाह ने ऐसा ज़हर घोला है,
पुराने यार भी अब बदगुमान होते जा रहे हैं।
हक़ीक़त चीखती रहती है, मगर सुनता नहीं कोई,
यहाँ झूठे फ़साने ही बयान होते जा रहे हैं।
हमारी बेगुनाही का कोई गवाह भी तो नहीं,
हम अपने ही शहर में बे-ज़ुबान होते जा रहे हैं।
जिसे खोने से डरते थे, वही हमसे दूर निकला,
हमारे अपने साए भी अनजान होते जा रहे हैं।
कभी रिश्तों में जो गर्मी थी, वो अब बाकी नहीं शायद,
मोहब्बत के सभी मौसम वीरान होते जा रहे हैं।
किसी दिन सच भी निकलेगा इन अफ़सानों की राखों से,
मगर तब तक न जाने कितने दिल ख़ाक होते जा रहे हैं।
अफ़वाहों के उड़ने से, रिश्ते ख़ाक होते जा रहे हैं,
जो अपने थे कभी, वो आज बेबाक होते जा रहे हैं।
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