ये क्या देश था, क्या मिट्टी थी, क्या हवा थी,
और क्या जवानी थी लोगों की।
हर चेहरे पर उम्मीद थी,
हर दिल में कहानी थी लोगों की।
नदियाँ गाती थीं, जंगल मुस्कुराते थे,
खेतों में जीवन की रवानी थी लोगों की।
धरती माँ की गोद में पलती,
एक सच्ची निगहबानी थी लोगों की।
बस परिंदे बिक गए,
लालच और नफ़रत की बुलंदी में।
इंसान इतना खो गया,
अपनी ही झूठी पसंदगी में।
मिट्टी ज़हर बन गई,
हवा में धुआँ भर गया।
वो जो कभी जवानी थी लोगों की,
वक़्त के बोझ तले मर गया।
अब शहर तो हैं, मगर साँसें नहीं,
तरक्की तो है, मगर इंसानियत नहीं।
आसमान रोता है, धरती तड़पती है,
और हम कहते हैं—कोई परेशानी नहीं।
फिर भी उम्मीद बाकी है,
अभी कुछ साँसें बाकी हैं।
अगर आज संभल जाएँ हम,
तो आने वाली नस्लों के लिए
धरती की मुस्कान बाकी है।
वक़्त है जानने का, वक़्त है करने का,
इस जलते हुए ग्रह को बचाने का।
वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—
"ये क्या देश था, क्या मिट्टी थी, क्या हवा थी,
और क्या जवानी थी लोगों की?"
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