रेल सी निकल गई तेज बहुत
पटरियों सा थरथराता रह गया
मुकाम था नहीं उसका कभी
खड़ा देखता बस वो रह गया.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X