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इश्क मुश्क कब छिपते हैं यार

                
                                                         
                            इश्क मुश्क दोनों कहाँ छिपते हैं ये यार
                                                                 
                            
बुढऊ जब खांसन लगे टूटे प्यार के तार .

उमर गई जब बीत सब खुले चक्षु के द्वार
मुट्ठी से गई रेत सब. साल महीने पार.

दाल भात रोटी लिये चिंतन का था सार
नर नारायण दूर सब. माया का संसार.

पायल कंगन भी बजे सजे खूब त्यौहार
जीवन कांटों से भरा सफ़र गया हर हार.

इच्छायें सबकी कभी पूरी होतीं कब यार
कठपुतली हैं सभी सुख दुःख अपरम्पार.
-दिनेश चौहान
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2 सप्ताह पहले

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