अजनबी बनकर चलो
अनजाने रास्ते ही चुनो
मंजिलें न कोई अपनी
पथ पर बस चलते रहो.
भटकने पर सुख मिले
छांव पाकर दुःख मिले
हाथ में बस हाथ हो
सिर्फ तेरा साथ हो.
गगन संग आँखे मगन
मन भरी तेरी छुअन
साँस में उठती तपन
और धरा का ताप हो.
घाट पर रखा दीया
पपीहे की पिय कहाँ
फूटे घड़े की प्यास सा
दर्द का संताप हो.
-दिनेश चौहान
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