आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फिसल गये पग

                
                                                         
                            कुछ लम्हे रुक जाते हैं चलते चलते
                                                                 
                            
मकड़ी रुक जाती जैसे चढ़ते चढ़ते.

ठहरा पल मुट्ठी में आ जाता जब भी
यादों में खो जाते फिर गिरते गिरते.

बाढ़ हृदय की नयनों तक आ पहुंची
फिसल गये पग घुँघरू बजते बजते.

गति इस मन की त्रीव हुई कुछ इतनी
छूट गई मंजिल पीछे,आगे बढ़ते बढ़ते.

यायावर बन हर कोई जग में चलता
तिल तिल वक़्त कटा ये चलते चलते.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर