कुछ लम्हे रुक जाते हैं चलते चलते
मकड़ी रुक जाती जैसे चढ़ते चढ़ते.
ठहरा पल मुट्ठी में आ जाता जब भी
यादों में खो जाते फिर गिरते गिरते.
बाढ़ हृदय की नयनों तक आ पहुंची
फिसल गये पग घुँघरू बजते बजते.
गति इस मन की त्रीव हुई कुछ इतनी
छूट गई मंजिल पीछे,आगे बढ़ते बढ़ते.
यायावर बन हर कोई जग में चलता
तिल तिल वक़्त कटा ये चलते चलते.
-दिनेश चौहान
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