शिकार भेड़ियों ने किये दावत सियारों ने उड़ाई
चील कौओं की बचे सामान में खूब बन आई.
सफ़र करते कटी जिन्दगी दूसरों के कन्धों पर
कभी खुद के पैरों पर चलने की नौबत न आई.
लोग बेवकूफी करते रहे आदतें पुरानी उनकी
कुछ समझदार लड़ते रहे कुर्सियों की लड़ाई.
फ़सल जब भी तैयार हुई काटने पहुँचे लोग
आंखें जिनकी खेतों की मेंड़ भी नहीं ढूंढ पाई.
जम्हूरियत खेल बन गया राजशाही लोगों का
कीमतें हर बार बेचारी इस जनता ने ही चुकाई.
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