कभी धूप कभी छांव
बेटी के पावन पांव .
संकट में याद आये
बीते दिन और गाँव.
पतझड़ के मौसम में
बबूल देते मिले छांव.
तड़पा बहुत मन देख
अपने उजड़े हुए ठांव.
कुछ नहीं पहले सा
लौट कर देखा गांव.
पीपल बरगद नहीं
दूर तक नहीं छांव.
बस गया शहर वहां
जहाँ बसता था गांव.
दिनेश चौहान
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