आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेटी के पांव

                
                                                         
                            कभी धूप कभी छांव
                                                                 
                            
बेटी के पावन पांव .

संकट में याद आये
बीते दिन और गाँव.

पतझड़ के मौसम में
बबूल देते मिले छांव.

तड़पा बहुत मन देख
अपने उजड़े हुए ठांव.

कुछ नहीं पहले सा
लौट कर देखा गांव.

पीपल बरगद नहीं
दूर तक नहीं छांव.

बस गया शहर वहां
जहाँ बसता था गांव.

दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर