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और फिर बुझता रहा मन

                
                                                         
                            पानी था, पहाड़ थे
                                                                 
                            
थे अनगिनत झरने
चिड़ियों की कलरव थी
हृदय के कंपन को महसूस करने
वाले लोग थे
सब दौर आये
और चले गये
नियति के अनुरूप
और फिर
बूझता रहा मन
-बिजय जोशी
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एक महीने पहले

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