माँ
----------------------------
काला टीका, काजल, चंदन,
दूध, मलाई, मिश्री, मक्खन।
जब-जब याद आती है,
देख तेरी प्यारी आँखें,
आँख मेरी भर आती है।
माँ तो आखिर माँ होती है,
जिसके चरणों में जहाँ होती है।
रब से पहले जिसका नाम,
जिसके चरणों में चारों धाम।
जिसका हृदय करुणा जैसा,
जिसकी ममता गंगा जैसी।
जो अँधेरे घर की शमा होती है।
माँ तो आखिर माँ होती है,
जिसके चरणों में जहाँ होती है।
माँ मज़बूत बनाती है,
माँ धैर्य सिखाती है।
नन्ही उँगली को पकड़कर,
माँ ही चलना सिखलाती है।
माँ के दिल जैसा दिल और कहाँ होता है।
माँ तो आखिर माँ होती है,
जिसके चरणों में जहाँ होती है।
माँ जन्नत का फूल है,
प्यार करना उनका उसूल है।
जो है जीवन का आधार,
जिसके बिना जीवन बेकार।
जिसके लिए स्वयं भगवान भी नतमस्तक होते हैं।
माँ तो आखिर माँ होती है,
जिसके चरणों में जहाँ होती है।
— धर्मेन्द्र कुमार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X