जब-जब सावन आयो रे,
तन में आग लगायो रे।
बैठी रहती हूँ टहनी पर,
मन में आस लगायो रे।
ग्रीष्म ऋतु की काली रातें,
दिल पर ठेस लगायो रे।
जब-जब सावन आयो रे,
तन में आग लगायो रे।
खत्म हो गई हँसकर जीना,
सावन की बगिया वीराना।
मौन हो गई जीवन मेरी,
भूल गई हूँ मैं कूकना।
प्रियतम की याद में अपनी,
पलकें रही बिछायो रे।
जब-जब सावन आयो रे,
मन में आस लगायो रे।
शुक्ल पक्ष की पूनम रातें,
याद अगन बनकर दहकातीं।
बिलख उठे दिल तन्हाई में,
अश्रु अँखियन से बह जाते।
टूट गई उस पेड़ की डाली,
जिस पर साथ बितायो रे।
जब-जब सावन आयो रे,
तन में आग लगायो रे।
अमुआ में जब मंजर आए,
प्रिय का संदेशा लाए।
हो गईं बंद आँखें मेरी,
जब प्रिय को पास न पाए।
तड़प-तड़पकर विरह-अग्नि में,
अपनी जान गँवायो रे।
जब-जब सावन आयो रे,
तन में आग लगायो रे।
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