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ख़्वाहिश नहीं है

                
                                                         
                            ख़्वाहिश
                                                                 
                            

ख़्वाहिश नहीं मुझे किसी दिल्लगी से दिल लगाने की,
किसी बेवफ़ा, बेमुरव्वत के पीछे कीमती समय गँवाने की।

मैं मानता हूँ कि मोहब्बत करना मेरी कमजोरी थी,
इसमें मेरा क्या कसूर, दिल तो उसने ही तोड़ी थी।

वो सोचती होगी, उसके बिना मर जाऊँगा मैं,
वो महज़ एक लड़की थी,
ऑक्सीजन थोड़ी थी।

अब अपनी कलम से सुबह-शाम लिखूँगा,
धोखेबाज़ों और मक्कारों में उसका भी नाम लिखूँगा।
लगा लूँगा मैं अपने लफ़्ज़ों पर बंदिश,
तन्हाई में जीने का इम्तिहान लिखूँगा।

सोचूँगा, तक़दीर ने मुझे धोखा दिया,
पर संभलने का भी एक मौका दिया।
सब देते हैं प्यार में हसीन लम्हे,
पर उसने मुझे एक अनोखा सबक दिया।

ख़्वाहिश नहीं मुझे किसी गैर को दिल में बसाने की,
किसी बेवफ़ा, बेमुरव्वत के पीछे कीमती समय गँवाने की।
- धर्मेन्द्र कुमार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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